बलात्कार Poem On A Rape Victim In Hindi | Pain Of A Rape Victim

हम सभी स्वतंत्रता से प्यार करते हैं, यह हर जीवित जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है चाहे वह इंसान हो या जानवर। कोई भी पाबंदियों में नहीं रहना चाहता, हर किसी को समानता का अधिकार है अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार है ।

वह एक मजबूत महिला है विनम्र और एक दयालु आत्मा है। उसके पास वह ममता है, जो सबको समझती है। उसकी उपस्थिति क्षतिग्रस्त लोगों के निशान को ठीक करती है, फिर भी महिलाओं को इतना कुछ सहना पड़ता है कि कोई भी पुरुष कल्पना नहीं कर सकता है, फिर भी, "उन्हें ही दोष दिया जाता है " सिर्फ इसलिए कि वे महिला/ लड़की , है । क्या ये सही है ? क्या लड़की होना गलत है ?


उन्हें एक सीमा में रहने को कहा जाता है, उन्हें पाबंदियों में रखा जाता है, उनके अधिकारों का हनन किया जाता है ओर उन्हें कौटुम्बिक व्यभिचार, यौन उत्पीड़न, हिंसा, बलात्कार, घरेलु हिंसा, बदमाशी, छेड़छाड़, का शिकार बनाया जाता है। मार दिया जाता है, आत्म हत्या करने पर मजबूर किया जाता है। आखिर क्यूँ ? क्योंकि मानवता अब नहीं रह गयी है। बची है तो बस क्रूरता।


मैं बस यही चाहता हूं कि हमें महिलाओं को समझना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए। उनके पैर कुतरने से अच्छा है कि हम कम पैर फैलायें ,ताकि हमारे बीच भी सुरक्षित महसूस कर सके ।


किसी भी अन्य लड़की के साथ कुछ भी बुरा करने से पहले बस इतना सोचें कि क्या होता, अगर वही व्यवहार उसके साथ किया जाए, जिसकी आपको परवाह है।

कुतरो मत पंख उनके , तुम थोड़े पंख पकड़ा दो अपने भले से ! मत मारो चोट अपने स्वाभिमान पर और उड़ान भरने दो ऊँची खुद से!!

"बलात्कार" Poem On A Rape Victim


चलो आज एक मुद्दे पे बात करते हैं रुह से नहीं तुम्हें जिस्म से ज्ञात करते हैं उन झुलसते हुए दिनों की नहीं , उन अंधेरों में कुचलती रातों की बात करते हैं। हर सवेरा मेरा बहबूब कहलाता है सूरज की किरण एक आईना दिखलाता है मजहब के इत्रों से दुर थी में , कि मेरा रूहानी इत्र ही मुझे बतलाता था। दरिंदों को यह बात रास ना आई रास्तों पे चलते उन्हें जिस्म की महक सी आई घूर के खाने की तलब थी उनकी तभी उनके आँखों में दरिंदगी सी आई।


कुछ दूर चलते ही मेरे पैर घबराने लगे बेबस से चेहरे पे पसीने सहलाने लगे धुप की किरण चुभती थी अक्सर आज तो बादल भी इतराने लगे ।

अब कुव्वत से जकड़ उनकी हैवानियत की पकड़ सहम चुकी थी मैं देख के उनकी आँखों की भड़क । रोंद रहे थे वो मेरे जिस्म को मेरे चीखते हालातों का सिलसिला सुरू हुआ आँखों से आँसू इस कदर बरस रहे थे की मेरे जिस्म का तड़पना सुरू हुआ ।


मेरे जिस्म को वो बर्बाद करना चाह रहे थे पर उन्हें नहीं पता ये जिस्म भी रूह से चलता है हैवान क्या जानें इज्जत का गुरूर उसे नहीं पता की इंसानियत भी इंसान से चलता है।


वो लोग अब जा चुके थे, छोड़ कर मेरे जिस्म को सड़क के कोने में बन कर लाश वंही पड़ी थी मैं होंसला टूटा हुआ और लगी रही मैं रोने में।

कुछ देर बाद खुद को समेट कर पहुँच गई घर हालातों को समझ कर डरी हुई थी मेरी रूह कि वो भी रो रही थी जिस्म को लपेट कर।

सोचा माँ से ज़िक्र करूँ पर हाथ पांव काँप रहे थे समाज में को मुंह उठाकर चला करती थी अब आँखें भी जमीन का रास्ता नाप रहे थे। अंदर ही अंदर मर रही थी मैं उस शाम कुछ बातें लिखना अच्छा समझा मेने कायरे थी में जो झुलस न पाई इस तपन से चांदनी रात में फांसी लगाकर मरना अच्छा समझा मैने।

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